गुमसुम से हैं आप आज क्या बात हुई।
इस सुनहरी सुबह में क्यूं धुधली रात हुई।।
ऊपर वाले को भी तनहाई न रास आई तो।
जरा जरा करके हम इंसानों की कायनात हुई।।
इक मुददत तक तडपता रहा इंतजार में मैं।
रुह निकली तो उनसे मुलाकात हुई।।
जिंदगी नर्क थी जब तक न मिली थी उसे।
वो मिली तो जिंदगी हयात हुई।।
कतरा कतरा जीने में क्या रखा है।
ऐसे जीयो कि जिंदगी हर रोज बारात हुई।।
मांगते मांगते जुबान मे पड गए छाले।
अपना हक आज वो खैरात हुई।।
Thursday, August 7, 2008
वो मिली तो जिंदगी हयात हुई
Monday, August 4, 2008
दर्द को हंसी के पैबंदों में छुपाते क्यूं हो
दर्द को हंसी के पैबंदों में छुपाते क्यूं हो।
रोने का सबब है यह मुस्कुराते क्यूं हो।।
ये वो हैं जिन्होंने न सुधरने की कसम खा रखी है।
इन लोगों को आखिर आईना दिखाते क्यूं हो।।
वही होगा जो मुकददर ने तय कर रखा है।
रह रह कर यही राग सुनाते क्यूं हो।।
तुमको शिकवा है कि सही राय नहीं देता मैं।
फिर हर बार मुझे अपने घर बुलाते क्यूं हो।।
Thursday, July 24, 2008
या खुदा आहिस्ता आहिस्ता यह रात चले
देख लो जो जरा कि जज्बात चले।
लब खुलें जो तुम्हारे तो बात चले।
चांद भी है और मेरा महबूब भी।
या खुदा आहिस्ता आहिस्ता यह रात चले।
आज विरान हो गया यह शहर कल तक जो आबाद था।
देखो किस रफ्तार से ये बेरहम हालात चले।।
किसी से मिलना तो इतनी गुंजाईश जरूर रखना।
कुछ चले ना चले इक अदद मुलाकात चले।।
चांद की सैर करी, तारों को तोड लाया मैं।
बैठे बैठे दिमाग में क्या क्या ख्यालात चले।।
देख लो जो जरा कि जज्बात चले।
लब खुलें जो तुम्हारे तो बात चले।
Tuesday, July 15, 2008
ढूढती होगी मां बेचैन नजरों से मुझे
तुमको देखा तो खामोशी से तर हो गया।
जिंदगी तेरी राहों में मैं रहगुजर हो गया।।
ताउम्र ना भरी चोट जिनसे लगी।
उन निगाहों का सदके नजर हो गया।।
रोते रोते अचानक मैं हंसने लगा।
उसकी सोहबत का ऐसा असर हो गया।।
तुमने ही तो लगाया था यह पौधा कभी।
पूछते हो हमसे यह कैसे जहर हो गया।।
ढूढती होगी मां बेचैन नजरों से मुझे।
घर से निकले हुए इक पहर हो गया।।
तुमको देखा तो खामोशी से तर हो गया।
जिंदगी तेरी राहों में मैं रहगुजर हो गया।।
Saturday, July 12, 2008
किस हक से अब गैरों को बुलाया जाए
सूनी आंखों में ख्वाबों को सजाया जाए।
चलो दूर कहीं इक शहर बसाया जाए।।
कब तक सोएगा मुसाफिर उस फुटपाथ पर।
सर तक धूप चढ आई है उसे जगाया जाए।।
जब अपनों ने ही नहीं छोडा किसी काबिल तो।
किस हक से अब गैरों को बुलाया जाए।।
क्यूं कहूं दोस्त तुमको,क्यूं तुम्हें याद करूं।
किस काम कि दोस्ती,जिसमें हर गम सुनाया जाए।।
देखते देखते कितने दूर चले गए तुम तो।
तुम्ही बताओ ना तुम्हें कैसे बुलाया जाए।।
बहुत रात हो चुकी है सोचते सोचते।
चलो चादर से अब इन सितारों को हटाया जाए।।
Tuesday, July 8, 2008
मुलायम जी क्या होगा इस सरकार का
क्या केंद्र की यूपीए सरकार गई। यह सवाल आज हर हिंदुस्तानी की जुबान पर है। एक लंबे मंथन के बाद आखिरकार वामपंथियों ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। हालांकि समाजवाद के झंडाबरदार मुलायम सिंह यादव ने सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है लेकिन क्या सरकार बरकरार रहेगी यह तो सदन में शक्ति परीक्षण के बाद ही तय होगा। अगर सरकार जाती है तो अमेरिका से हुए आणविक समझौते पर आंच जरूर आ जाएगी।
लोकसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं। यह बात वामपंथी अच्छी तरह जानते हैं। अब लोकसभा चुनाव वह सरकार के साथ मिलकर तो लड नहीं सकते। इसलिए सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक साथ रहने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। अब कार्यकाल से पहले सरकार का साथ छोडना है तो उसका कारण भी चाहिए। आणविक समझौते से बढिया विकल्प उन्हें मिल भी नहीं सकता था। अब एक अरसे तक बातचीत, चेतावनी और मान मनौवल के बाद उन्हें एक रास्ता तो चुनना ही था सो चुन लिया।
अब बात जरा मुलायम है। सरकार बनी तो यूपीए ने अमर सिंह और मुलायम को पूछा भी नहीं। हालांकि अमर सिंह बिन बुलाए मेहमान की तरह सरकार को समर्थन देने सोनिया गांधी के यहां पहुंचे भी थे। खैर सरकार भी बन गई और वामपंथियों के सहयोग से चलने भी लगी। इस दौरान कई बार समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस पर कई तीखे वार किए। इस दौरान कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को भी अमर सिंह ने नसीहत दे डाली और सोनिया पर भी बरसे। अब ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी की हितैसी नजर आने लगी है। और तो और आणविक करार भी देशहित में नजर आने लगा है। कहीं यह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के कोप से बचने का उपाय तो नहीं। कहीं यह अगला लोकसभा चुनाव कांग्रेस और यूपीए घटक के साथ मिलकर लडने का पहला कदम तो नहीं।
Wednesday, July 2, 2008
एक अरसे बाद गुजरा था उसी मोड से मैं
थम गईं सांसे,रुक गई दिल की धडकन।
एक अरसे बाद गुजरा था उसी मोड से मैं।।
जहां पहली बार तुम्हे देखा था।
जहां पहली बार तमसे की थी बात।
जहां पहली बार तुम सकुचाईं थीं।
जहां पहली बार बोलीं थीं तुम।
जहां अक्सर हम मिल ही जाते थे।
जहां पहुंचकर तुम सिकुड जाती थीं।
जहां कुछ देर वक्त ठहर जाता था।
जहां मेरा हर गम निपट जाता था।।
जहां तुमने किया था इकरार कभी।
जहां पूरे हुए थे मेरे ख्वाब सभी।
जहां दौडा था जी भर के खुशी से कभी।
जहां बैठे रहते थे छुपके दोस्त सभी।।
जहां आखिरी बार मिले थे उस दोपहरी में।
जहां आखिरी बार तुम्हें जी भर देखा था।
जहां आखिरी बार चला था साथ तेरे।
जहां आखिरी बार भरी थी गहरी सांस मैंने।।
अब तो यह मोड भी पूछती है मुझसे।
क्यूं छोड कर चली गई तुम मुझको।
अब यहां से गुजरने में डर लगता है।
जैसे इस मोड पर खडी तुम तलाशती हो मुझे।।
Sunday, June 29, 2008
हम आइने की तरह साफ हैं
हम आइने की तरह साफ हैं।
जो हकीकत है वही दिखाते हैं।।
घरों को तोडने वालों जरा उनसे पूछो।
तिनका तिनका जोड के जो घर बनाते हैं।।
जिंदगी के हर मोड पर जिनके साथ खडे रहे।
वक्त पडने पर क्यूं वही हमें आजमाते हैं।।
हम खा चुके हैं धोखा किसी पर भरोसा करके।
जमात न बढे अपनी इसलिए हर वादा निभाते हैं।।
वक्त ने छीन लिए जब सारे राजदार हमसे।
हम भी इंसान हैं दीवारों को अपने किस्से सुनाते हैं।
Saturday, June 28, 2008
मुझे मत मारो,मुझे जीने दो
आज सुबह जैसे ही टीवी चालू किया एक ऐसी खबर सामने आई जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया। और मैं तो यह कहूंगा कि इस खबर पर हर मां बाप को सोचना चाहिए कि आखिर हम अपने बच्चे को क्या दे रहे हैं अपनी अगली पीढी को कहां ले जा रहे है। हम क्यूं उनसे उनका बचपन छीनकर उन्हें समय से पहले बडा बना रहे हैं और इसके लिए यह हक हमें किसने दिया। हां आपको वह खबर तो बता दूं। खबर थी कि कोलकाता के एक रियालिटी शो के दौरान जजों ने एक बच्ची को कुछ इस तरह बेइज्जत किया कि वह कोमा में चली गई। शिंजनी नाम की यह लडकी अब न बोल पा रही है न सुन पा रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या हम अपनी संतानों को उस मुहाने पर लाकर नहीं खडा कर रहे या उस दिशा में नहीं भेज रहे जहां वह अपना मानसिक और शारीरिक संतुलन खो सकते हैं। क्या हम उनके उपर समय से पहले वह बोझ नहीं डाल रहे जो एक तय सीमा के बाद पडना चाहिए। क्या बच्चों को प्रतिस्पर्धा की बेदी पर चढाना सही है। एक वक्त था जब मां बाप अपने बच्चों को पांच साल की उम्र तक स्कूल नहीं भेजते थे। पांच साल की उम्र तक बच्चा अपने बचपने को जीता था दोस्तों के साथ खेलता था और मस्ती करता था और जब पांच साल की उम्र में उसका स्कूल में दाखिला होता था तो नर्सरी क्लास उस बच्चे को मिलती थी। नर्सरी के बाद वह पहली जमात में पहुंचता था। मगर अब हालात बदल चुके हैं अब तो दो साल के बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। स्कूलों ने भी यूकेजी एलकेजी तो इस तरह की तमाम क्लासें इजाद कर दी हैं जो इन बच्चों के बचपन को निपटा रही है। हां इस व्यवस्था में मां बाप की गैर जिम्मेदारी पूरी तरह से झलकती है। मां बाप भी बच्चों को पालने से डरते हैं या उनके पास इतना समय नहीं बचा कि वह अपने बच्चे के बचपने को सहेज सकें। यह तो सब जानते हैं कि सबकी आईक्यू एक बराबर नहीं होती और हो भी नहीं सकती क्योंकि उपर वाले ने कुछ भी एक जैसा नहीं बनाया और न बनाएगा। फिर हम क्यों अपने बच्चों को एक जैसा बनाने पर तूले हैं। हम क्यूं चाहते हैं कि हमारा बच्चा आलराउंडर निकले। वह गवइया भी बने, नाचे भी और तबला भी बजाए। साथ ही पढे भी। हम क्यों उसे एक ऐसे मंच पर ढकेल देते हैं जहां उसे उस उम्र में वह मानसिक और शारीरिक तनाव झेलना पडता है जो उसके मौजूदा मानिसक और शारीरिक हिसाब से बहुत बडी है। मैं उन सभी मां बाप से अपील करता हूं कि इस मामले पर एक बार गौर से सोचे और अपने बच्चे की आंखों में झांक कर देखें कि क्या उसका बचपन छीनने का हक आपको है।
Tuesday, June 24, 2008
टीवी युग में अखबार
त्वरित संचार के इस काल में जब हर शहर की छोटी बडी खबरें हमारे टीवी स्क्रीन पर उपलब्ध हो जा रही हैं तो अखबार क्यों। यह वह सवाल है जो नई पीढी का कोई भी बंदा बेझिझक पूछ सकता है। सवाल वाकई में सोचने पर मजबूर करता है कि अखबार क्यों। आज जब हमारे पास इतना वक्त नहीं कि हम चैन से सो सकें या अपने बच्चों का होमवर्क करा सकें तब 18 या 22 पेज का कोई अखबार पढना एक आदमी के लिए कितना मुनासिब हो सकता है। यह प्रेक्टिकल बात है इस पर गौर करने की जरूरत है। मौजूदा समय में अखबार को जो सबसे ज्यादा चुनौती मिल रही है वह इंटरनेट से है। इंटरनेट पर आज हर खबर मौजूद है। बावजूद इसके अखबार का वजूद अब भी देश में बहुत मजबूत है और आने वाले समय में इस वजूद में इजाफे की पूरी संभावनाएं दिख रही हैं। यह भी सोचने वाली बात है। अखबार का प्रसार और पाठक संख्या जैसा कि अखबारों के सर्वे बताते हैं बढती ही जा रही है। इसके कई कारण हैं। इन सभी कारणों पर बाकायदा बहस कराई जा सकती है। अखबारों के बढने के पीछे एक मजबूत कारण जो मुझे दिखाई देता है वह यह है कि अखबार आज हमारे लिए स्टेटस सिंबल की तरह काम कर रहे हैं या फिर अखबार लेना एक तरह की मजबूरी हो गई है कि अखबार तो घर में आना ही चाहिए चाहे उसे कोई पढे या न पढे। हां एक बार नजर दौडा ली जाए तो बेहतर है। दूसरा कारण जो अभी दिखाई दे रहा है वह लाभ कि स्थिती से है। अखबारी दुनिया में आए बूम ने देश में जो प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी है उसका नतीजा यह निकला है कि अब देश के अधिकांश अखबार स्कीम की बदौलत बिक रहे हैं। साथ ही सालाना बुकिंग के साथ। इसमें अखबार की रददी और गिफ्ट का बडा रोल है। यह दो मुख्य वजहें अभी फिलहाल तो अखबारों के प्रचार प्रसार और पाठक संख्या को बढा रही हैं। केबल और इंटरनेट के इस युग में अखबार जिंदा है वह भी पूरे शान के साथ। कारण चाहे कुछ भी हो और अखबार आने वाले समय में भी इसी तरह जिंदा रहेगा अब यह देखना है कैसे। चलिए सुबह अखबार भी पढना है।
Sunday, June 22, 2008
चलो ना कहीं दूर चलें
चलो ना कहीं दूर चलें,इस भीडभाड से।
जहां भोर अजान और हनुमान चालीसा से हो।
जहां सुबह को मुर्गा बांक दे।
दोपहर उस बागीचे की छांव में गुजरे।
शाम हरे भरे खेतों की मेढों को नापे।
और रात इतनी लंबी हो कि हर थकान मिट जाए।।
चलो ना कहीं दूर चलें,इस भीडभाड से।
जहां कल को संवारने में आज न खराब हो।
जहां सुख दुख के साथी तमाम हों।
जहां दादी नानी का प्यार हो।
जहां रिश्तों की दरकार हो।
चलो ना कहीं दूर चलें,इस भीडभाड से।
चलो ना कहीं दूर चलें,इस भीडभाड से।।
Saturday, June 21, 2008
हर लम्हा मारकर भी जिलाती रही मुझे
कुछ इस तरह से जिंदगी सताती रही मुझे।
हर लम्हा मारकर भी जिलाती रही मुझे।।
गफलत में न पड जाउं कभी किसी गुमान में।
हर रोज एक बार वो आइना दिखाती रही मुझे।।
इस डर से कि कभी दूर न हो जाउं उससे मैं।
रह रह के बार बार वो बुलाती रही मुझे।।
संजीदगी मेरे चेहरे पे नागवार थी उसको।
चेहरा बदल बदल कर वो हंसाती रही मुझे।।
हर रंग दुनियादारी का देख रखा था उसने।
इसलिए अपने आंचल में वो छुपाती रही मुझे।।
कुछ इस तरह से जिंदगी सताती रही मुझे।
हर लम्हा मारकर भी जिलाती रही मुझे।।
Tuesday, June 17, 2008
तेरे शहर में तुझे ढूढते जमाने गुजर गए
मिलते थे जिनसे रोज वो जाने किधर गए।
तेरे शहर में तुझे ढूढते जमाने गुजर गए।।
टुकडों टुकडों की नींद से बटोरे थे कुछ सपने।
ऐसी हवा चली कि वो सारे बिखर गए।।
वक्त ने क्या सितम किया कैसे बताएं हम।
वो हर शहर उजड गया हम जिधर गए।।
न जाने क्या कशिश थी उसकी निगाह में।
जिन पर पडी नजर वो कातिल सुधर गए।।
मिलते थे जिनसे रोज वो जाने किधर गए।
तेरे शहर में तुझे ढूढते जमाने गुजर गए।।
Monday, June 16, 2008
हां अब बदल गया इंसान
बच्चे नहीं खेलते अब गलियों में।
भौंरे नहीं आते अब कलियों में।
क्यों अब माएं नहीं सुनाती लोरी।
क्यों सपने सारे हो गए चोरी।।
हमने खो दी अपनी पहचान।
हां अब बदल गया इंसान।
हां अब बदल गया इंसान।।
कहां गए खेत खलिहान।
कहां गई अपनी दालान।
क्यों अब हम एक साथ नहीं खाते।
चंदा मामा अब क्यों नहीं आते।।
क्योंकि हमने खो दी अपनी पहचान।
हां अब बदल गया इंसान।
हां अब बदल गया इंसान।।
दूसरे का सुख अब नहीं देखा जाता।
सच बोलना अब हमें नहीं आता।
छोड दिया अब हाथ से खाना।
पांव छूने का गया जमाना।
अंगरेजी बनी हमारी शान।
क्योंकि हमने खो दी अपनी पहचान।
हां अब बदल गया इंसान।
हां अब बदल गया इंसान।।
Saturday, June 14, 2008
जिंदा रहने के लिए सौ बार भी मर जाउंगा
सांस दर सांस तेरे जिश्म में उतर जाउंगा।
जिंदा रहने के लिए सौ बार भी मर जाउंगा।।
इक मुददत के बाद अब जाकर खुद को जोडा है।
अबकी रूठोगे तो हर सिम्त बिखर जाउंगा।।
जानता हूं कि शक्ल ओ सूरत से बडा कमतर हूं।
पर एक ना एक दिन उन आंखों में संवर जाउंगा।।
मैं तो मुसाफिर हूं जरा देर के लिए ठहरा हूं।
हकीकत यही है कि यहां से भी गुजर जाउंगा।।
इस उम्र में कर लेने दो नादानियां जी भर के मुझे।
वक्त जब आएगा तो मैं भी सुधर जाउंगा।।
सांस दर सांस तेरे जिश्म में उतर जाउंगा।
जिंदा रहने के लिए सौ बार भी मर जाउंगा।।
