Tuesday, June 24, 2008

टीवी युग में अखबार

त्वरित संचार के इस काल में जब हर शहर की छोटी बडी खबरें हमारे टीवी स्क्रीन पर उपलब्ध हो जा रही हैं तो अखबार क्यों। यह वह सवाल है जो नई पीढी का कोई भी बंदा बेझिझक पूछ सकता है। सवाल वाकई में सोचने पर मजबूर करता है कि अखबार क्यों। आज जब हमारे पास इतना वक्त नहीं कि हम चैन से सो सकें या अपने बच्चों का होमवर्क करा सकें तब 18 या 22 पेज का कोई अखबार पढना एक आदमी के लिए कितना मुनासिब हो सकता है। यह प्रेक्टिकल बात है इस पर गौर करने की जरूरत है। मौजूदा समय में अखबार को जो सबसे ज्यादा चुनौती मिल रही है वह इंटरनेट से है। इंटरनेट पर आज हर खबर मौजूद है। बावजूद इसके अखबार का वजूद अब भी देश में बहुत मजबूत है और आने वाले समय में इस वजूद में इजाफे की पूरी संभावनाएं दिख रही हैं। यह भी सोचने वाली बात है। अखबार का प्रसार और पाठक संख्या जैसा कि अखबारों के सर्वे बताते हैं बढती ही जा रही है। इसके कई कारण हैं। इन सभी कारणों पर बाकायदा बहस कराई जा सकती है। अखबारों के बढने के पीछे एक मजबूत कारण जो मुझे दिखाई देता है वह यह है कि अखबार आज हमारे लिए स्टेटस सिंबल की तरह काम कर रहे हैं या फिर अखबार लेना एक तरह की मजबूरी हो गई है कि अखबार तो घर में आना ही चाहिए चाहे उसे कोई पढे या न पढे। हां एक बार नजर दौडा ली जाए तो बेहतर है। दूसरा कारण जो अभी दिखाई दे रहा है वह लाभ कि स्थिती से है। अखबारी दुनिया में आए बूम ने देश में जो प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी है उसका नतीजा यह निकला है कि अब देश के अधिकांश अखबार स्कीम की बदौलत बिक रहे हैं। साथ ही सालाना बुकिंग के साथ। इसमें अखबार की रददी और गिफ्ट का बडा रोल है। यह दो मुख्य वजहें अभी फिलहाल तो अखबारों के प्रचार प्रसार और पाठक संख्या को बढा रही हैं। केबल और इंटरनेट के इस युग में अखबार जिंदा है वह भी पूरे शान के साथ। कारण चाहे कुछ भी हो और अखबार आने वाले समय में भी इसी तरह जिंदा रहेगा अब यह देखना है कैसे। चलिए सुबह अखबार भी पढना है।

Sunday, June 22, 2008

चलो ना कहीं दूर चलें

चलो ना कहीं दूर चलें,इस भीडभाड से।
जहां भोर अजान और हनुमान चालीसा से हो।
जहां सुबह को मुर्गा बांक दे।
दोपहर उस बागीचे की छांव में गुजरे।
शाम हरे भरे खेतों की मेढों को नापे।
और रात इतनी लंबी हो कि हर थकान मिट जाए।।
चलो ना कहीं दूर चलें,इस भीडभाड से।
जहां कल को संवारने में आज न खराब हो।
जहां सुख दुख के साथी तमाम हों।
जहां दादी नानी का प्यार हो।
जहां रिश्तों की दरकार हो।
चलो ना कहीं दूर चलें,इस भीडभाड से।
चलो ना कहीं दूर चलें,इस भीडभाड से।।

Saturday, June 21, 2008

हर लम्हा मारकर भी जिलाती रही मुझे

कुछ इस तरह से जिंदगी सताती रही मुझे।
हर लम्हा मारकर भी जिलाती रही मुझे।।

गफलत में न पड जाउं कभी किसी गुमान में।
हर रोज एक बार वो आइना दिखाती रही मुझे।।

इस डर से कि कभी दूर न हो जाउं उससे मैं।
रह रह के बार बार वो बुलाती रही मुझे।।

संजीदगी मेरे चेहरे पे नागवार थी उसको।
चेहरा बदल बदल कर वो हंसाती रही मुझे।।

हर रंग दुनियादारी का देख रखा था उसने।
इसलिए अपने आंचल में वो छुपाती रही मुझे।।

कुछ इस तरह से जिंदगी सताती रही मुझे।
हर लम्हा मारकर भी जिलाती रही मुझे।।

Tuesday, June 17, 2008

तेरे शहर में तुझे ढूढते जमाने गुजर गए

मिलते थे जिनसे रोज वो जाने किधर गए।
तेरे शहर में तुझे ढूढते जमाने गुजर गए।।

टुकडों टुकडों की नींद से बटोरे थे कुछ सपने।
ऐसी हवा चली कि वो सारे बिखर गए।।

वक्त ने क्या सितम किया कैसे बताएं हम।
वो हर शहर उजड गया हम जिधर गए।।

न जाने क्या कशिश थी उसकी निगाह में।
जिन पर पडी नजर वो कातिल सुधर गए।।

मिलते थे जिनसे रोज वो जाने किधर गए।
तेरे शहर में तुझे ढूढते जमाने गुजर गए।।

Monday, June 16, 2008

हां अब बदल गया इंसान

बच्चे नहीं खेलते अब गलियों में।
भौंरे नहीं आते अब कलियों में।
क्यों अब माएं नहीं सुनाती लोरी।
क्यों सपने सारे हो गए चोरी।।
हमने खो दी अपनी पहचान।
हां अब बदल गया इंसान।
हां अब बदल गया इंसान।।

कहां गए खेत खलिहान।
कहां गई अपनी दालान।
क्यों अब हम एक साथ नहीं खाते।
चंदा मामा अब क्यों नहीं आते।।
क्योंकि हमने खो दी अपनी पहचान।
हां अब बदल गया इंसान।
हां अब बदल गया इंसान।।

दूसरे का सुख अब नहीं देखा जाता।
सच बोलना अब हमें नहीं आता।
छोड दिया अब हाथ से खाना।
पांव छूने का गया जमाना।
अंगरेजी बनी हमारी शान।
क्योंकि हमने खो दी अपनी पहचान।
हां अब बदल गया इंसान।
हां अब बदल गया इंसान।।

Saturday, June 14, 2008

जिंदा रहने के लिए सौ बार भी मर जाउंगा

सांस दर सांस तेरे जिश्म में उतर जाउंगा।

जिंदा रहने के लिए सौ बार भी मर जाउंगा।।

इक मुददत के बाद अब जाकर खुद को जोडा है।

अबकी रूठोगे तो हर सिम्त बिखर जाउंगा।।

जानता हूं कि शक्ल ओ सूरत से बडा कमतर हूं।

पर एक ना एक दिन उन आंखों में संवर जाउंगा।।

मैं तो मुसाफिर हूं जरा देर के लिए ठहरा हूं।

हकीकत यही है कि यहां से भी गुजर जाउंगा।।

इस उम्र में कर लेने दो नादानियां जी भर के मुझे।

वक्त जब आएगा तो मैं भी सुधर जाउंगा।।

सांस दर सांस तेरे जिश्म में उतर जाउंगा।

जिंदा रहने के लिए सौ बार भी मर जाउंगा।।

Monday, June 9, 2008

उस जनवरी की वह सर्द भोर

आज भी याद है मुझको।

उस जनवरी की वह सर्द भोर।

जब नींद आंखों से गायब थी।

क्योंकि उनमें तू जो समाई थी।।

आज भी याद है मुझको।

उस जनवरी की वह सर्द भोर।।

यकीन नहीं होता अब।

कि तब किस्मत भी थी मेहरबान।

निकलता था जब भी कहीं।

तो तू मिल ही जाती थी।

और ऐसा लगता था।

मानो सफल हो गया जागना मेरा।

आज भी याद है मुझको।

उस जनवरी की वह सर्द भोर।।

अब तो एक अरसा गुजर गया।

अब तो देर तक सोता हूं।

अब जनवरी में ठंड भी बहुत लगती है।

लेकिन आज भी याद है मुझको।

उस जनवरी की वह सर्द भोर।।

Sunday, June 8, 2008

बिछ गई है बिसात शतरंज की

बिछ गई है बिसात शतरंज की अब।
एक को जीतना तो एक को हारना होगा।।

जिंदा रहने की इस लडाई में।
जाने किस किस को मारना होगा।।

झूठ इक उम्र जी चुका अपनी।
सच से अब उसका भी सामना होगा।।

ताउम्र टिक नहीं सकता कोई उस ऊंचाई पर।
इस हकीकत को तुम्हें भी मानना होगा।।

माथे की लकीरें पढने वाले अब कहां हैं दुनिया में।
सब झूठ का पुलिंदा है इस बात को जानना होगा।।

जब टूट जाए आस इस दुनिया से।
तब उस खुदा का हाथ ही थामना होगा।।

Saturday, June 7, 2008

अब तो आदत सी हो गई है मुस्कुराने की

बात पते की है इसलिए बतानी थी।
अब तो आदत सी हो गई है मुस्कुराने की।।

उन्होंने कह रखा है कि मुंह नहीं खोलना।
इसलिए अपनी आदत है गुनगुनाने की।।

रूठने वालों का दर्द हमको मालूम है।
इसलिए कोशिश करते हैं सबको मनाने की।।

अपने दरवाजे पर खडा रहता हूं जोकर बन कर।
जरा सी चाहत है मुसाफिरों को हंसाने की।।

हमसफर दोस्तों इस बात का ख्याल रखना।
तुम्हारे एक साथी की आदत है डगमगाने की।।

किसी से वादा बडा सोच समझ कर करते हैं।
क्या करें दिमाग में एक कीडा है जो सलाह देता है इसे निभाने की।।

बात पते की है इसलिए बतानी थी।
अब तो आदत सी हो गई है मुस्कुराने की।।

Thursday, June 5, 2008

जी भर देख लो तो

जी भर देख लो तो आंखों में उतर जाता है।
ये वो शहर है जो हर रोज उजड जाता है।।

हर रोज बिकती हैं यहां कई जिंदा लाशें।
पर अफसोस हर कोई तमाशबीन बन देखता रह जाता है।।

अपना खून गिरा तो खून दूसरे का गिरा तो पानी।
या खुदा क्या ऐसे ही इंसां का जमीर मर जाता है।।

ख्वाब न देख ऐसे जो आंखों में न समाएं।
हकीकत का आइना हर रंग उडा देता है।।

उस चांद को देखा है कभी पूरी अकीदत से।
किसी रोज वह भी एक चलनी में उतर जाता है।।

Sunday, June 1, 2008

ब्रेकिंग न्यूज ब्रेकिंग न्यूज

राजस्थान बना आईपीएल का शहंशाह
एक जबरदश्त मैच में चेन्नई के चीतों को मात देकर राजस्थान रायल्स ने आईपीएल का ताज अपने सर सजा लिया। मैच वाकई बहुत रोचक रहा। लास्ट दो ओवरों का मजा तो जबरदस्त था। इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। खैर एक तमाशा खत्म अगले कर करिए इंतजार।

Saturday, May 31, 2008

वह हज्जाम भी था और.....

आज सुबह रोज की तरह उठकर अखबार को तलाशा। उसके हाथ में आते ही बैठ गया ढुढने खबरें। हां खबरों से रोज का वास्ता है लेकिन आदतन और मजबूरन खबरें पढनी ही पडती हैं। आदतन इसलिए कि इतने सालों से पढ रहा हूं तो तलब लगती है,मजबूरी इस बात की कि दूसरे अखबार क्या लिख रहे हैं, अपने सेंटर की कोई बडी खबर मिस तो नहीं हुई। खैर यह सब तो रोज का है नया यह कि अखबार जो मेरे हाथ में था उसमें उस खबर पर नजर टिक गई जिसमें उन तमाम मशहूर बावर्ची भाईयों का जिक्र था जो मुंबई में हाथोंहाथ बिकते हैं और जो तमाम फिल्मी और राजनैतिक लोगों की पार्टियों में उनके मेहमानों के लिए लजीज खाना तैयार करते हैं। अब आप कहेंगे कि इसमें ऐसी क्या बात है कि नजर टिक गई या इस पर पूरी पोस्ट लिखी जाए। सही है। मगर इन रसोईयों और पार्टियों ने मुझे वह बात याद दिला दी जिसे मैं आप सब से शेयर करना चाहता हूं। बात यूं है कि हम ठहरे गांव के और वह भी पूरे ठेठ गांव के। जहां मुश्किल से अभी दस साल पहले बिजली का आगमन हुआ। हमारे गांव में कुछ नहीं तो चार पांच सौ घर तो होंगे ही। अब गांव के सभी लोगों के दाढी और बाल बनाने के लिए दो हज्जाम थे। दोनों ने अपने अपने हिसाब से गांव को बांट रखा था। हफते में एक दिन आते थे और पूरे गांव की सफाई कर जाते थे। इनमें से एक सज्जन थे बदरेआलम। उम्र करीब 45 50 के दरम्यान की रही होगी। पूरे मजाकिया और मसखरे। बडों के बाल तो ठीकठाक काट देते थे मगर बच्चों के बात तो अजीब अजीब स्टाइल में काट देते थे। वह सारे स्टाइल इस समय या तो फैशन में हैं या कुछ दिन पहले तक फैशन में थे। मगर उस समय उस गांव के माहौल में मजाक का सबब। बच्चे गाली देते थे और वह हंसकर टाल देते, लेकिन अपनी आदत उन्होंने नहीं छोडी। अब सोचता हूं अगर वह होते या उनके हाथ चलते तो वह किसी महानगर में अच्छी खासी कमाई कर सकते थे। अरे मैं तो मूल मुददे से भटक रहा हूं। बात कर रहे थे बावर्चीगीरी की। तो गांव में जब भी कोई शादी होती या कोई ऐसा कार्यक्रम होता जिसमें गांव भर के लोगों का भोज होता तो यही दोनों हज्जाम खाना बनाते। हां इस काम में पूरा गांव उनका साथ देता। मसाले गांव भर की महिलाएं सिलवटों पर पीसतीं तो सारे मर्द प्याज छीलने से लेकर काटने तक का काम करते। यही नहीं चावल धोने से लेकर गोश्त धोने का काम भी मर्दों के जिम्मे होता। फिर हज्जाम आग जलाकर आग जलाता फिर देग चढाकर खाना बनाता। समय कहां से कहां पहुंच गया मगर सच पूछिए तो वह खाना और वह माहौल आज भी बहुत याद आता है।

Tuesday, May 27, 2008

क्यूं नहीं आती अब रात छत पर।

क्यूं नहीं आती अब रात छत पर।
क्यूं नहीं अब भोर गुनगुनाते हैं।।
क्यूं नहीं अब कूकती है कोयल।
क्यूं नहीं अब खेत लहलहाते हैं।।
क्यूं नहीं अब सांझ शरमाती है।
क्यूं नहीं अब फूल खिलखिलाते हैं।।
क्यूं नहीं अब बारिश हंसती है।
क्यूं नहीं अब भौंरे गुनगुनाते हैं।।

इसलिए रात नहीं आती छत पर
कि हमने छत पर जाना छोड दिया।
इसलिए अब नहीं गुनगुनाता भोर
कि हमने उसे बुलाना छोड दिया।
इसलिए नहीं कूकती कोयल
कि हमने उसे चिढाना छोड दिया।
इसलिए खेत अब नहीं लहलहाते
कि हमने हंसना छोड दिया।
इसलिए नहीं अब सांझ शरमाती
कि हमने उसे आईना दिखाना छोड दिया।
इसलिए अब नहीं खिलखिलाते फूल
कि हमने उन्हें हंसाना छोड दिया।
इसलिए नहीं अब बारिश हंसती
कि हमने अब उसमें नहाना छोड दिया।
इसलिए नहीं अब अब गुनगुनाते भौंरे
कि हमने मुस्कुराना छोड दिया।।

Monday, May 26, 2008

ब्लाग जगत के लिए यह खतरे की घंटी है

कहते है आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। प्राचीन युग से अब तक हमें समय समय पर तमाम चीजों की जरूरत पडी और हमने अपनी जरूरत को महसूस करते हुए वह तमाम चीजें इजाद भी कीं। यह बात दिगर है कि उन तमाम चीजों में से कितनी ही आगे चलकर हमारे लिए घातक साबित हुईं। पिछले कुछ दिनों से ब्लागजगत पर हो रही हाय हाय और आरोप प्रत्यारोप से भी कुछ ऐसा ही इशारा मिल रहा है। ब्लाग का इजाद हुए अभी बहुत दिन नहीं हुए या यूं कह लें कि अभी ब्लाग जगत का शैशव काल ही चल रहा है। मगर अभी से इसके चिंताजनक वह पहलू सामने आने लगे हैं जो कुछ कुछ हमारे ही द्वारा इजाद किए गए उन चीजों से मेल खाते हैं जो हमारे लिए घातक साबित हुए। व्यक्तिगत रूप से अब मैं यह महसूस करने लगा हूं कि जिस ब्लाग को मैं या अन्य कुछ साथी हिंदी जगत या लेखनी के विकास का एक जरिया मान रहे थे या कुछ साथी अपने संस्मरण या अपने जज्बात सहेज कर रखने वाला एक सजाया गया कमरा समझ रहे थे दरअसल वह ब्लाग कुछ लोगों के लिए सिर्फ और सिर्फ बकवास निकाले, गाली गलौच करने एक दूसरे की बखिया उधेडने और एक दूसरे को नीचा दिखाने का जरिया बनता जा रहा है। यह निश्चित रूप से एक ऐसा बुरा संकेत है जो ब्लाग जगत के अंत या इसके बेहद कुरूप हो जाने का इशारा करता है। कुछ लोग बहुत जल्द बहुत बडा बनने का सपना देखते हैं और ऐसे लोग विवाद को विकास का साधन समझ हर रोज एक नया बखेडा खडा करना चाहते हैं ताकि ब्लाग जगते के लोग उनके पचडे में पडकर उन्हे अहमियत दें और वह दिनोंदिन मशहूर होते जाएं। यह एक ऐसी नापाक कोशिश है जिसे अगर ब्लागर समझ जाएं तो इनके मंसूबों पर पानी फिर सकता है। ऐसे ब्लागरों का बहिष्कार किया जाना चाहिए जो इस तरह की हरकत करें। यह ब्लागजगत के हित में है। यह एक अपील है।

Friday, May 23, 2008

आज सब इक ख्याल आया

आज सब इक ख्याल आया।
जवाब ढूढा मगर सवाल आया।।
क्यूं नहीं पूछ लिया उससे दिल की बात।
रह रह कर यही मलाल आया।।
जिसको नकारा समझती रही दुनिया।
जिंदगी के इम्तिहान में वह कमाल आया।।
अलहदा वो सबसे इसलिए है कि।
जहीन सबसे उसका जमाल आया।।
मुफ्त में खाने की पड गई आदत जिसको।
क्या फर्क पडता है क्या हराम आया क्या हलाल आया।।
आज सब इक ख्याल आया।
जवाब ढूढा मगर सवाल आया।।
अबरार अहमद