बुरे वक्त में मुस्कुराने की बात करते हो।
नए दौर में गुजरे जमाने की बात करते हो।।
जबानदराजी का वक्त गुम हो गया कहीं।
क्यूं साहेब से फिजूल के सवाल करते हो।।
अपनी ही गलतियों की सजा भोग रहे हो तुम।
क्यूं पडोसी की किस्मत का मलाल करते हो।।
अब आडत डाल लो कत्ल होने की रोज रोज।
क्योंकि तुम भी किसी को रोज हलाल करते हो।।
बुरे वक्त में मुस्कुराने की बात करते हो।
नए दौर में गुजरे जमाने की बात करते हो।।
Wednesday, February 4, 2009
क्यूं साहेब से फिजूल के सवाल करते हो
Wednesday, October 29, 2008
यह हमारी आस्था का सवाल है
कई दिनों से ब्लाग से दूर रहा। इसके लिए सभी ब्लगर साथियों से क्षमा चाहूंगा। थोडी व्यस्तता रही इन दिनों या यूं कह लें कि फेस्टिवल सीजन ने उलझाए रखा। काम ही अपना ऐसा है। खैर इन दिनों बहुत कुछ ऐसा रहा जिससे हम ही नहीं पूरी दुनिया सकते में रही। आर्थिक मंदी ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि अमेरिका से लेकर जापान तक कभी भी ढह सकते हैं। पूंजी का दम दिखा लोगों को। सेंसेक्स ऐसा गिरा कि कईयों को ले गया। आईसीआईसीआई बैंक के दिवालिया होने की अफवाह भी उडी और कामत जी को स्थिति साफ करनी पडी। जेट ने राज ठाकरे के नाम पर 1900 कर्मचारियों को फिर नौकरी पर रखा तो एक बिहारी युवक को सरेआम एनकाउंटर कर दिया गया। अब असल मुददे पर चलते हैं। कई दिनों से दिमाग में एक बात चल रही है। मन में अजीब हलचल है। पेशानी पर बल पडे हुए हैं और मन में ऐसी भडास है कि फट जाने को जी कर रहा है। बाजार आज पूरी तरह से हम पर हावी हो चुका है। आज जो कुछ बाजार चाह रहा है हम वही कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि बाजार मदारी है और हम बंदर। आज हमारी आस्था यह बाजार तय कर रहा है। हमें कैसे पूजा करनी है, त्योहार या पर्व पर क्या करना है क्या नहीं करना यह सब बाजार तय कर रहा है। गरीब का तो कोई धर्म ही नहीं बचा। कोई त्योहार ऐसा नहीं बचा जिसे वह पूरी आस्था से पूरे साजो सामान के साथ मना सके। पुराने रस्म और पुरातन चीजों की जगह बाजार के रेडिमेट आइटमों और नए रस्मों ने ले ली है। चीजें बदल रही हैं बडी तेजी से बाजार के लिए। जगह जगह कुछ ऐसे लोगों को बिठा दिया गया है जो हमे बाजार के हिसाब से आस्था को पूरी करने की सलाह दे रहे हैं। संचार और समाचार के माध्यम भी बाजार के मुताबिक पढा रहे हैं और दिखा रहे हैं। यह एक बुरा संकेत है। अब हमे यह तय करना है कि हमे बाजार के हिसाब से चलना है या खुद के। सवाल जरा कठिन है लेकिन जवाब हमे ढूढना ही होगा।
Sunday, October 12, 2008
कभी इश्क ने जुदा किया कभी इश्क ने मिला दिया
कभी इश्क ने जुदा किया कभी इश्क ने मिला दिया।
कभी इश्क ने हंसा दिया कभी इश्क ने रुला दिया।
पलकों पर जब भी नींद ने रखने चाहे अपने कदम।
नजरों ने तेरी आ के मुझे आहिस्ते से जगा दिया।।
हर रास्ते पर अब तो मुझे मंजिल नजर आने लगी।
तूने हाथ क्या पकडा मेरा हर फासला मिटा दिया।।
जिंदगी कितने रंगों में अब मेरे सामने आने लगी।
बेरंग ख्वाबों में मेरे तूने रंग भरना सीखा दिया।।
कभी इश्क ने जुदा किया कभी इश्क ने मिला दिया।
कभी इश्क ने हंसा दिया कभी इश्क ने रुला दिया।
Thursday, October 9, 2008
रावण तुम्हे जिंदा रहना होगा
रावण तुम जिंदा रहो यूं ही। सालों साल,सदियों तक। ऐसे ही अपने दसों चेहरों के साथ। अगर तुम मर गए तो राम का क्या होगा। सच्चाई का क्या होगा। तुम ही तो वह एकमात्र साक्ष्य हो जो कहता है कि इस धरती पर कभी राम ने अवतार लिया था, इस धरती पर कभी धर्म का अधर्म से युद्ध हुआ था, सच के सामने बुराई का नाश हुआ था। अब राम सेतु को ही ले लो। आज तक उसके अस्तित्व पर सवाल उठाए जा रहे हैं कल हो सकता है राम के अस्तित्व पर सवाल खडा हो जाए तो जवाब कौन देगा। कौन लोगों को बताएगा कौन सरकार को बताएगा कि राम ने धरती पर अवतार लिया था। इसलिए हे रावण तुम्हारा जिंदा रहना जरूरी है। बेहद जरूरी। हे रावण तुम्हारा जिंदा रहना इसलिए भी जरूरी है कि तुम एक बडे शिक्षक हो इस समाज के लिए, हमारी नई पीढी के लिए अगर तुम्हारा अंत हो गया तो हमारे समाज को रास्ता कौन दिखाएगा हमारी भावी पीढी को सचाई और बुराई का फर्क कौन समझाएगा। आज हममें वो कुबत नहीं रही कि हम अपने बच्चों को सही राह दिखा सकें, आज हम खुद झूठ और बुराई का सहारा ले रहे हैं। इसलिए हे रावण तुम्हारा जिंदा रहना अति आवश्यक है।
Sunday, September 28, 2008
अमर उजाला में गूंजे लफ्ज

राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अमर उजाला ने अपने 25 सितंबर के अंक में संपादकीय पेज के ब्लाग कोना कालम के तहत लफ्ज को स्थान दिया है। इस लेख में इसलाम और इंसानियत को जिंदा रखने की बात मैंने उठाई थी। अमर उजाला का आभार जो उसने इस समसामयिक विषय पर लिखे लेख को इंटरनेट के माध्यम से निकालकर जन जन तक पहुंचाया। क्योंकि भले ही हम इसे इंटरनेट युग कहें लेकिन यह सच है कि अभी भी देश की एक बडी आबादी इंटरनेट की पहुंच से दूर है।
Tuesday, September 23, 2008
इस्लाम और इंसानियत खतरे में
मन अंदर ही अंदर मुझे कचोट रहा है। एक अरसे से। संभालने की कोशिश की एक आम आदमी की तरह। एक आम हिंदुस्तानी की तरह मगर रोक न सका खुद को। चाहे जयपुर धमाका हो या अहमदाबाद, यूपी के तमाम शहरों में बम फटे हों या दिल्ली को तबाह करने की नापाक कोशिश की गई हो हर बार दिल से एक आह जरूर निकली। एक पत्रकार होने के नाते भले ही रोया नहीं लेकिन इंसान होने के नाते आंखें नहीं मानीं। बेगुनाह लोगों को निशाना बनाने उनहें मारने और तबाही फैलाने का हक कोई भी धर्म किसी को नहीं देता। इस्लाम भी नहीं। इस बात को समझना होगा।
इंडियन मुजाहिददीन के नेटवर्क के खुलासे ने सबको चौंका दिया है। इस आतंकी फौज में जितने भी सदस्य शामिल हैं वह 16 से 30 साल के हैं। सब पढे लिखे और सभ्य परिवारों से हैं। इनके परिवार का कोई भी सदस्य अपराधी पृष्ठभूमि से नहीं। यह युवक भी पढे लिखे हैं और इनमें से कई उच्च शिक्षा हासिल कर रहे थे और सबसे अहम बात यह कि अब तक जीतने भी युवक पकडे गए हैं वह सभी मुसलमान हैं। और जो नाम सामने आ रहे हैं वह भी मुस्लिम ही हैं।
मैं खुद मुसलमान हूं और इस खुलासे से आहत हूं। मेरा मानना है कि अब वाकई में इस्लाम खतरे में है और इसे बचाने के लिए जेहाद की जरूरत है। वह कौन लोग हैं जो आपके बच्चों को बरगला कर आतंक की राह पर पहुंचा रहे है। क्या वजह है कि पढा लिखा मुसलमान इंसानियत का फर्ज भूलकर तबाही की राह पकड रहा है। वह कौन है जो इस्लाम को नेस्तानाबूद करने पर तूला है। जरूरत है तो अपने बच्चों को सही तालिम देने की। उन्हें समझाने की और इंसानियत का पाठ पढाने की ताकि हमारी अगली पीढी किसी नापाक हाथ की कठपुतली न बन सके। देश भर के मुसलमान भाईयों को अब जेहाद छेडनी होगी तभी इस्लाम को बचाया जा सकेगा तभी इंसानियत को बचाया जा सकेगा।
यह एक लंबी लडाई है। लेकिन इसकी शुरुआत आज से ही हो जानी चाहिए। अगर इस्लाम को बचाना है तो हमे अपनी अगली पीढी को सही राह दिखानी होगी। वह राह जो दिन की राह है। और यह जिम्मेदारी हमारे धर्म गुरुओं की है। जरूरत है कि वह आगे आएं और लोगों से इस बात कि अपील करें उन्हें सही राह दिखाएं।आतंकवाद के खिलाफ उलेमा आगे आए हैं लेकिन इस बात को एक सिस्टम के तहत लाना होगा। उन्हें धर्म का सही मकसद और इंसानियत का पाठ पढाने के लिए एक व्यवस्था बनानी होगी। आखिर यह इस्लाम के वजूद का मामला है। इंसानियत के वजूद का मामला है।
Tuesday, September 16, 2008
दर्द को सीने में हमसे पिरोया न गया
दर्द को सीने में हमसे पिरोया न गया
गिरते रहे आंसू मगर जी भर रोया न गया।
तुमको पाने की जिद में कुछ यूं जागा कि
सदियों तक इन आंखों से सोया न गया।।
किसी शबनम ने तर कर दिया मुझको ऐसे कि
चाहकर भी कभी इस बदन को भिगोया न गया।।
Monday, September 1, 2008
आखिर हम भी एक दिन बेइमान हो गए
ये तोहमत कि हम बदजुबान हो गए।
इसी बहाने कुछ अपने कद्रदान हो गए।
इमानदारी के लफ्जो को बेचते बेचते।
आखिर हम भी एक दिन बेइमान हो गए।।
हर रोज जानवरों का किरदार निभाते रहे।
पूछा जो खुदा ने तो कहा हम इंसान हो गए।।
हमारी शक्ल देखकर रास्ता बदलने वाले।
आज क्या बात कि सरकार मेहरबान हो गए।।
क्या बना दूं और कौन सी नियामत लाऊं।
बडी मुददत के बाद वो मेरे मेहमान हो गए।।
हमने झेले हैं गमों और मुश्किलों के तुफां को।
आप तो इन आंधियों में ही परेशान हो गए।।
Thursday, August 7, 2008
वो मिली तो जिंदगी हयात हुई
गुमसुम से हैं आप आज क्या बात हुई।
इस सुनहरी सुबह में क्यूं धुधली रात हुई।।
ऊपर वाले को भी तनहाई न रास आई तो।
जरा जरा करके हम इंसानों की कायनात हुई।।
इक मुददत तक तडपता रहा इंतजार में मैं।
रुह निकली तो उनसे मुलाकात हुई।।
जिंदगी नर्क थी जब तक न मिली थी उसे।
वो मिली तो जिंदगी हयात हुई।।
कतरा कतरा जीने में क्या रखा है।
ऐसे जीयो कि जिंदगी हर रोज बारात हुई।।
मांगते मांगते जुबान मे पड गए छाले।
अपना हक आज वो खैरात हुई।।
Monday, August 4, 2008
दर्द को हंसी के पैबंदों में छुपाते क्यूं हो
दर्द को हंसी के पैबंदों में छुपाते क्यूं हो।
रोने का सबब है यह मुस्कुराते क्यूं हो।।
ये वो हैं जिन्होंने न सुधरने की कसम खा रखी है।
इन लोगों को आखिर आईना दिखाते क्यूं हो।।
वही होगा जो मुकददर ने तय कर रखा है।
रह रह कर यही राग सुनाते क्यूं हो।।
तुमको शिकवा है कि सही राय नहीं देता मैं।
फिर हर बार मुझे अपने घर बुलाते क्यूं हो।।
Thursday, July 24, 2008
या खुदा आहिस्ता आहिस्ता यह रात चले
देख लो जो जरा कि जज्बात चले।
लब खुलें जो तुम्हारे तो बात चले।
चांद भी है और मेरा महबूब भी।
या खुदा आहिस्ता आहिस्ता यह रात चले।
आज विरान हो गया यह शहर कल तक जो आबाद था।
देखो किस रफ्तार से ये बेरहम हालात चले।।
किसी से मिलना तो इतनी गुंजाईश जरूर रखना।
कुछ चले ना चले इक अदद मुलाकात चले।।
चांद की सैर करी, तारों को तोड लाया मैं।
बैठे बैठे दिमाग में क्या क्या ख्यालात चले।।
देख लो जो जरा कि जज्बात चले।
लब खुलें जो तुम्हारे तो बात चले।
Tuesday, July 15, 2008
ढूढती होगी मां बेचैन नजरों से मुझे
तुमको देखा तो खामोशी से तर हो गया।
जिंदगी तेरी राहों में मैं रहगुजर हो गया।।
ताउम्र ना भरी चोट जिनसे लगी।
उन निगाहों का सदके नजर हो गया।।
रोते रोते अचानक मैं हंसने लगा।
उसकी सोहबत का ऐसा असर हो गया।।
तुमने ही तो लगाया था यह पौधा कभी।
पूछते हो हमसे यह कैसे जहर हो गया।।
ढूढती होगी मां बेचैन नजरों से मुझे।
घर से निकले हुए इक पहर हो गया।।
तुमको देखा तो खामोशी से तर हो गया।
जिंदगी तेरी राहों में मैं रहगुजर हो गया।।
Saturday, July 12, 2008
किस हक से अब गैरों को बुलाया जाए
सूनी आंखों में ख्वाबों को सजाया जाए।
चलो दूर कहीं इक शहर बसाया जाए।।
कब तक सोएगा मुसाफिर उस फुटपाथ पर।
सर तक धूप चढ आई है उसे जगाया जाए।।
जब अपनों ने ही नहीं छोडा किसी काबिल तो।
किस हक से अब गैरों को बुलाया जाए।।
क्यूं कहूं दोस्त तुमको,क्यूं तुम्हें याद करूं।
किस काम कि दोस्ती,जिसमें हर गम सुनाया जाए।।
देखते देखते कितने दूर चले गए तुम तो।
तुम्ही बताओ ना तुम्हें कैसे बुलाया जाए।।
बहुत रात हो चुकी है सोचते सोचते।
चलो चादर से अब इन सितारों को हटाया जाए।।
Tuesday, July 8, 2008
मुलायम जी क्या होगा इस सरकार का
क्या केंद्र की यूपीए सरकार गई। यह सवाल आज हर हिंदुस्तानी की जुबान पर है। एक लंबे मंथन के बाद आखिरकार वामपंथियों ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। हालांकि समाजवाद के झंडाबरदार मुलायम सिंह यादव ने सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है लेकिन क्या सरकार बरकरार रहेगी यह तो सदन में शक्ति परीक्षण के बाद ही तय होगा। अगर सरकार जाती है तो अमेरिका से हुए आणविक समझौते पर आंच जरूर आ जाएगी।
लोकसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं। यह बात वामपंथी अच्छी तरह जानते हैं। अब लोकसभा चुनाव वह सरकार के साथ मिलकर तो लड नहीं सकते। इसलिए सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक साथ रहने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। अब कार्यकाल से पहले सरकार का साथ छोडना है तो उसका कारण भी चाहिए। आणविक समझौते से बढिया विकल्प उन्हें मिल भी नहीं सकता था। अब एक अरसे तक बातचीत, चेतावनी और मान मनौवल के बाद उन्हें एक रास्ता तो चुनना ही था सो चुन लिया।
अब बात जरा मुलायम है। सरकार बनी तो यूपीए ने अमर सिंह और मुलायम को पूछा भी नहीं। हालांकि अमर सिंह बिन बुलाए मेहमान की तरह सरकार को समर्थन देने सोनिया गांधी के यहां पहुंचे भी थे। खैर सरकार भी बन गई और वामपंथियों के सहयोग से चलने भी लगी। इस दौरान कई बार समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस पर कई तीखे वार किए। इस दौरान कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को भी अमर सिंह ने नसीहत दे डाली और सोनिया पर भी बरसे। अब ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस समाजवादी पार्टी की हितैसी नजर आने लगी है। और तो और आणविक करार भी देशहित में नजर आने लगा है। कहीं यह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के कोप से बचने का उपाय तो नहीं। कहीं यह अगला लोकसभा चुनाव कांग्रेस और यूपीए घटक के साथ मिलकर लडने का पहला कदम तो नहीं।
Wednesday, July 2, 2008
एक अरसे बाद गुजरा था उसी मोड से मैं
थम गईं सांसे,रुक गई दिल की धडकन।
एक अरसे बाद गुजरा था उसी मोड से मैं।।
जहां पहली बार तुम्हे देखा था।
जहां पहली बार तमसे की थी बात।
जहां पहली बार तुम सकुचाईं थीं।
जहां पहली बार बोलीं थीं तुम।
जहां अक्सर हम मिल ही जाते थे।
जहां पहुंचकर तुम सिकुड जाती थीं।
जहां कुछ देर वक्त ठहर जाता था।
जहां मेरा हर गम निपट जाता था।।
जहां तुमने किया था इकरार कभी।
जहां पूरे हुए थे मेरे ख्वाब सभी।
जहां दौडा था जी भर के खुशी से कभी।
जहां बैठे रहते थे छुपके दोस्त सभी।।
जहां आखिरी बार मिले थे उस दोपहरी में।
जहां आखिरी बार तुम्हें जी भर देखा था।
जहां आखिरी बार चला था साथ तेरे।
जहां आखिरी बार भरी थी गहरी सांस मैंने।।
अब तो यह मोड भी पूछती है मुझसे।
क्यूं छोड कर चली गई तुम मुझको।
अब यहां से गुजरने में डर लगता है।
जैसे इस मोड पर खडी तुम तलाशती हो मुझे।।
