अब तक इस ब्लाग पर जो कुछ भी लिखा गया है वह मेरे जेहन की उपज है। लेकिन आज यहां किसी और को जगह दे कर मैं यह परंपरा तोड रहा हूं और इसके पीछे जो कारण है वह मैं आप सबसे बांटना जरूर चाहूंगा। कल मेरी मुलाकात एक ऐसे शख्स से हुई जो पहले पहल तो बिल्कुल साधारण सा लगा लेकिन कुछ समय साथ बैठकर बातें जो हुईं तो एहसास हुआ कि यह शख्श वाकई में खास है। वो ऐसे कि उसके पास साहित्य की इतनी अच्छी समझ और जानकारी थी कि मैं तो बस उसे सुनता ही रह गया। जी तो कर रहा था कि उससे वो तमाम जानकारियां ले लूं जो मेरे पहले की हैं। लेकिन वक्त कमबख्त किसका हुआ है जो मेरा होता। और हमने एक दूसरे को फिर मिलने के वादे के साथ अलविदा कह दिया। लेकिन इस मुलाकात के बीच जो दो शेर इस शख्स से सुनाए उन्होंने मुझे झिंझोड कर रख दिया। कल से अब तक वो दोनों शेर मेरे जेहन में कौंध रहे है। यही वजह है कि इन दोनों शेरों को मैं अपने इस ब्लाग पर जगह दे रहा हूं। मुझे यह नहीं मालूम कि यह दोनों शेर किस शाइर के हैं अगर किसी साथी के पास इन दोनों शेरों के और भी लाइनें हों तो मुझको भी जरूर बताएं। वो दोनों शेर इस तरह हैं।
1 लौटकर मां बाप खूब रोए अकेले में।
मिटटी के खिलौने भी सस्ते नहीं थे मेले में।
2 मुनव्वर कभी मां के सामने खुलकर मत रोना।
जहां नींव हो वहां इतनी नमी अच्छी नहीं।।
Saturday, April 11, 2009
जहां नींव हो वहां इतनी नमी अच्छी नहीं
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7 comments:
बढ़िया संस्मरण और बढ़िया शेर.
achche shayar ko har jagah achche log hi milte hain.. zara blog dekho Voters ke liye ek information daali hai.
संस्मरण सुंदर है।
दोनों शेर लाजवाब हैं।
आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूं, अच्छा लगा यहां आकर।
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सम्मोहन के यंत्र
5000 सालों में दुनिया का अंत
bhai gajab hai
अबरार भाई, आपका ब्लॉग देखा बहुत अच्छा, बल्कि बहुत ही अच्छा है. अच्छा लिखते हैं आप.
आपका हमारे ब्लॉग स्वच्छसन्देश.ब्लागस्पाट.कॉम (swachchhsandesh.blogspot.com) पर स्वागत है.
आपका भाई
सलीम खान
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
Bahut achha likha aap ne,,,,,,,,,,
दोनों शेर बहुत ही अच्छे हैं, एक वक्त के बाद पढे हैं, अच्छा लगा
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