चोट खाकर भी मुस्कुराते नहीं तो क्या करते।
दिल के जज्बात दिल में दबाते नहीं तो क्या करते।।
भरी महफिल में जब उन्होंने न पहचाना हमको।
नजर हम अपनी झुकाते नहीं तो क्या करते।।
उनके दुपट्टे में लगी आग न हमसे देखी जाती।
हाथ हम अपना जलाते नहीं तो क्या करते।।
दोस्तों ने जब सरे राह छोड दिया मुझको।
तब हम गैरों को बुलाते नहीं तो क्या करते।।
किस मुददत से वो देख रहा था राह मेरी।
वादा हम अपना निभाते नहीं तो क्या करते।।
चोट खाकर भी मुस्कुराते नहीं तो क्या करते।।
दिल के जज्बात दिल में दबाते नहीं तो क्या करते।
Wednesday, May 14, 2008
चोट खाकर भी मुस्कुराते नहीं तो...
Tuesday, May 13, 2008
15 मिनट, 9 ब्लास्ट और 70 जानें फनां
देश की गुलाबी नगरी जयपुर मंगलवार को खून से लतपथ लाल नगरी में तब्दील हो गई। शाम करीब सवा सात बजे से लेकर साढे सात बजे तक दहशत के जो धमाके हुए उन्होंने इस शहर को हिला कर रख दिया। जानकारी के मुताबिक करीब 180 लोग इन धमाकों में घायल हुए हैं। यह धमाके पुरी तरह से सुनियोजित थे। धमाकों के लिए जयपुर के वह इलाके चुने गए थे जो पूरी तरह से खचाखच भरे रहते हैं। यह इलाके जहा एक ओर पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं वहीं मंगलवार होने के नाते इन इलाकों में हनुमान जी की पूजा करने के लिए अधिकांश लोग जमा हुए थे। धमाके उसी तरह किए गए जिस तरह से मुम्बई, हैदराबाद, फैजाबाद आदि शहरों में किए गए यानि इन धमाकों में भी साइकिल का इस्तेमाल किया गया। इन साइकिलों पर विस्फोटक रखे गए थे।
कहीं पर्यटन को निशाना बनाना मकसद तो नही
जम्मू कश्मीर में दहशतगर्दों ने पर्यटन को नुकसान पहुंचा कर वहां के लोंगों को आर्थिक तौर पर कमजोर कर दिया है। इसका असर वहां के लोंगे के रहन सहन और शिक्षा पर पडा है। जाहिर सी बात है जहां जहालत होगी वहां खुराफात तो पनपेगा ही। इसका सीधा असर यह हुआ है कि वहां के नौजवान आतंकवाद की तरफ मुड रहे हैं। दूसरे वहां के हालात खराब दिनों दिन खराब हो रहे हैं और आतंकवाद को बल मिल रहा है। राजस्थान भी पर्यटन की नजर से महत्वपूर्ण राज्य है। ऐसा लगता है कि आतंकवादी अब राजस्थान के पर्यटन को निशाना बनाना चाहते हैं। क्योंकि अगर वहां से भी पर्यटन उठ गया तो राजस्थान के हालात भी करीब करीब जम्मू कश्मीर की तरह हो सकते हैं। एक कारण यह भी है कि राजस्थान की सीमाएं भी पाकिस्तान से सटती हैं।
जागरूक होने की जरूरत
देश में हालात ऐसे है कि हर चौथे पांचवे महिने में कहीं ना कहीं सिलसिलेवार बम बलास्ट हो रहे हैं ऐसे में हम सब के जागरूक होने की जरूरत बढ गई है। अगर जनता जागरूक हो जाए तो ऐसी वारदातों को बहुत हद तक रोका जा सकता है। कहीं भी संदिग्ध बैग या लावारिस सामान के दिखते ही तुरंत पुलिस को सुचित करें। संदिग्ध लोगों पर नजर रखें। एकजुटता दिखाएं और बुराई के खिलाफ जंग को हमेशा तैयार रहें।
Saturday, May 10, 2008
मां मैं अंश हूं तेरा
मां मैं अंश हूं तेरा।
मुझमे समाहित हैं तेरे विचार
संस्कार तेरा प्यार।।
तू जननी है मेरी, मेरे गुणों की।
मां मैं अंश हूं तेरा।।
तूने ही मुझको चलना सीखाया।
ये जीवन है क्या तुम्ही ने बताया।।
मुसीबत से लडना भी तुमने सीखाया।
मैं आवाज हूं मां तेरी धडकनों का।
तू जननी है मेरी, मेरे व्यक्तित्व की।
मां मैं अंश हूं तेरा।।
जहां भी रहूंगा तेरा नाम लूंगा।
तेरे आंसुओं को अपनी पलकों पर थाम लूंगा।
मेरी हर खुशी तेरी चरणों में माते।
मैं कर्जदार हूं तेरी हर एक सांस का।
तू जननी है मेरी, मेरी भावनाओं की।
मां मैं अंश हूं तेरा।
मां मैं अंश हूं तेरा।।
मां यह शब्द सुनते ही हम खुद को सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं। यह केवल एक शब्द ही नहीं ममता की वह विशाल छांव है जो हमे हर मुसीबत और विपदा से बचा कर रखती है। यह शब्द सुनते ही हम खुद को एक बच्चा महसूस करते हैं चाहे हमारी उम्र जो भी हो। साथ ही हमारा बचपना भी झलकने लगता है। सभी साथियों से अपील है कि इस कविता को पढने के बाद एक बार मां शब्द का उच्चारण जरूर करें। देखिएगा इससे कितना सुकून मिलेगा। तो कहिए मां।
Monday, May 5, 2008
मां अब मैंने देख ली है दुनिया
अब खुद उठकर पी लेता हूं पानी।
अब जली रोटियां भी खा लेता हूं।
अब नहीं खलता खाने में सब्जी का न होना।
मां अब मैंने देख ली है दुनिया।।
अब कोई नहीं पूछता कहां गए थे।
अब कोई नहीं पूछता क्या कर रहे हो।
अब कोई नहीं पूछता आगे क्या करोगे।
अब्बू अब मैंने देख ली है दुनिया।।
अब मुझसे नहीं लडते मेरे भाई।
अब बहन नहीं करती कोई जिद।
अब दोस्त नहीं ले जाते घूमने के लिए।
अब मैंने देख ली है दुनिया।।
हां अम्मी मैंने देख ली है दुनिया।।
अबरार अहमद
Saturday, May 3, 2008
वो जहर है मगर....
वो जहर है मगर दवा का असर रखता है।
आंखों से अंधा है मगर पारखी नजर रखता है।।
उसके हुनर को कहीं जंग न लग जाए इसलिए।
वह अपने हाथों में एक पोशीदा कसर रखता है।।
उसको नजरबंद करने की बात भी सोच ली कैसे।
वो हवा है हर जगह अपनी रहगुजर रखता है।।
और एक दिन सिमट जाना है सबको दो गज जमीन में।
पड जाए आदत इसलिए वह इतनी ही बसर रखता है।।
वो जहर है मगर दवा का असर रखता है।
आंखों से अंधा है मगर पारखी नजर रखता है।।
अबरार अहमद
Thursday, May 1, 2008
तब जी भर कर रो लेता हूं।
अपनों से दूर होने का दर्द जब सरहदें तोड देता है।
कोई अपना जब अचानक मुहं मोड लेता है।।
रात जब काटे नहीं कटती है।
हर वक्त जब उलझन सी रहती है।।
तब जी भर कर रो लेता हूं।
जब नानी की आवाज कानों में गूंज जाती है।
मां की आंखों में जब पानी की बूंद आती है।।
अब्बू का चेहरा जब याद आता है।
दोस्तों का मजाक जब सताता है।।
तब जी भर कर मैं रो लेता हूं।।
जब किसी के किचन से खुशबू आती है।
जब वो चौराहे और गलियां याद आती हैं।।
तब फिर मैं जी भर कर रो लेता हूं।
अबरार अहमद
Thursday, April 24, 2008
एक नया शिगूफा आया है
फोटो साभार : MSN
अबरार अहमद
Wednesday, April 23, 2008
ये मुहब्बत की इन्तहां नहीं तो
ये मुहब्बत की इन्तहां नहीं तो और क्या है।
समंदर आज भी प्यासा है किसी की चाहत में।।
शोरगुल में जिंदगी को ढुढते हो ये दोस्त तुम भी।
कभी गौर से देखना इसे खामोशी की आहट में।।
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जी तो करता है कि आज फिर से चूम लूं तेरी पेशानी को।
पर अफसोश आज मैं तुझसे से कहीं छोटा हूं।
वक्त ने छीन लिए सारे कांधे मुझसे।
इसलिए अब दीवारों से लग के रो लेता हूं।।
जी तो करता है कि आज फिर से चूम लूं तेरी पेशानी को।
पर अफसोश...................
अबरार अहमद
Friday, April 18, 2008
बिग बी भी उतरे मैदान में
Thursday, April 17, 2008
उनकी यादों को चरागों की तरह
उनकी यादों को चरागों की तरह हर शाम जलाए रखा।
कुछ इस तरह से हमने उन्हें अपना बनाए रखा।।
कडकती धूप में मेरा पांव न जल जाए कहीं।
मेरे महबूब ने इसलिए मुझे घंटों बिठाए रखा।।
और यह तुफान तो अब आया है अपने उरोज पर।
उस समंदर से पूछो जिसने इसे बरसों दबाए रखा।।
कुछ न छुपाने कि कसम तुमने तो दी थी मुझको।
मगर एक बात थी जिसे हमने ताउम्र तुमसे छुपाए रखा।।
उनकी यादों को चरागों की तरह हर शाम जलाए रखा।
कुछ इस तरह से हमने उन्हें अपना बनाए रखा।।
Wednesday, April 16, 2008
पलकों में आंसूओं को
पलकों में आंसूओं को छुपाते चले गए।
हम इस तरह से इश्क निभाते चले गए।।
मैं कहते कहते थक गया कि मैं नशे में हूं।
लेकिन वो मुझको और पिलाते चले गए।।
हर जख्म नासूर बन चुका था मगर वो।
सितम दर सितम हम पर ढाते चले गए।।
चलने का तमीज मुझको आ जाए एक बार।
इसलिए नजरों से बार बार वो गिराते चले गए।।
अबरार अहमद
Thursday, April 10, 2008
अधूरे ख्वाब थे मेरे तेरे आने से पहले
अधूरे ख्वाब थे मेरे तेरे आने से पहले।
मचलते जज्बात थे मेरे तेरे आने से पहले।।
हरसू भटकता रहता था गलियों गलियों में।
आवारा नाम था मेरा तेरे आने से पहले।।
तूने जिंदगी जीना सीखा दिया मुझको।।
टूटता साज था मेरा तेरे आने से पहले।।
मुझे संभाल लेगा कोई अब इस बात की तसल्ली है।
कदम लडखडाते थे मेरे तेरे आने से पहले।।
तेरे आने से हो गया जर्रा जर्रा रौशन।
अंधेरे साथ थे मेरे तेरे आने से पहले।।
अधूरे ख्वाब थे मेरे तेरे आने से पहले।
मचलते जज्बात थे मेरे तेरे आने से पहले।।
Sunday, April 6, 2008
इस बदलते दौर में

इस बदलते दौर में इतना तो ख्याल रखा है।
हया के चादर में रिश्तों को संभाल रखा है।।
तलाशते तलाशते जिनको इक उम्र गुजर गई अपनी।
उस मंजिल को तमाम रास्तों ने संभाल रखा है।।
मुकददर को कोसने वालों सुन लो।
अपने हाथों में तुमने वो मलाल रखा है।।
इस सूरत में ढूढते हो हमारे सीरत की तस्वीर क्यूं।
वक्त ने दे के सबकुछ हमें अब भी फटेहाल रखा है।।
हो तो जरा मसजिद तक हो आउं मैं भी।
इक मुददत से इस दिल गुनाहों को पाल रखा है।।
अबरार अहमद






