Saturday, June 21, 2008

हर लम्हा मारकर भी जिलाती रही मुझे

कुछ इस तरह से जिंदगी सताती रही मुझे।
हर लम्हा मारकर भी जिलाती रही मुझे।।

गफलत में न पड जाउं कभी किसी गुमान में।
हर रोज एक बार वो आइना दिखाती रही मुझे।।

इस डर से कि कभी दूर न हो जाउं उससे मैं।
रह रह के बार बार वो बुलाती रही मुझे।।

संजीदगी मेरे चेहरे पे नागवार थी उसको।
चेहरा बदल बदल कर वो हंसाती रही मुझे।।

हर रंग दुनियादारी का देख रखा था उसने।
इसलिए अपने आंचल में वो छुपाती रही मुझे।।

कुछ इस तरह से जिंदगी सताती रही मुझे।
हर लम्हा मारकर भी जिलाती रही मुझे।।

5 comments:

jasvir saurana said...

bhut hi sundar rachana.likhate rhe.

अनिल भारद्वाज, लुधियाना said...

बहुत खूब। लिखते रहो। साधुवाद।

सुकांत महापात्र said...

अबरार भाई। वाकई में जिंदगी ऐसी ही है। बहुत बढिया। बधाई।

mehek said...

bahut sahi zindagi hasati,chupati,aur satati bhi hai,har sher lajawab bahut badhai.

Devi Nangrani said...

Bahut Umda gazal Zindagi ke kayi rang bikherti hui, sunder radeef ke saath
Ek sher is Zindagi ki nazar:

Katraake Zindagi se yoon, tum bach n paaoge
Har mod par yahi to sikhati rahi mujhe.

Daad ke saath
Devi Nangrani