Sunday, June 29, 2008

हम आइने की तरह साफ हैं

हम आइने की तरह साफ हैं।
जो हकीकत है वही दिखाते हैं।।

घरों को तोडने वालों जरा उनसे पूछो।
तिनका तिनका जोड के जो घर बनाते हैं।।

जिंदगी के हर मोड पर जिनके साथ खडे रहे।
वक्त पडने पर क्यूं वही हमें आजमाते हैं।।

हम खा चुके हैं धोखा किसी पर भरोसा करके।
जमात न बढे अपनी इसलिए हर वादा निभाते हैं।।

वक्त ने छीन लिए जब सारे राजदार हमसे।
हम भी इंसान हैं दीवारों को अपने किस्से सुनाते हैं।

7 comments:

सुकांत महापात्र said...

बहुत खूब अबरार भाई। बधाई।

Udan Tashtari said...

हम खा चुके हैं धोखा किसी पर भरोसा करके।
जमात न बढे अपनी इसलिए हर वादा निभाते हैं।।


--बेहतरीन!!

mehek said...

wah bahut khubsurat

श्रद्धा जैन said...

wah wah wah Abrar ji
kamaal
aap to bhaut hi achha likhte ho ab aapke har kalaam ka intezaar rahega

ishq sultanpuri said...

bahut khoob likha hai

Anonymous said...

लाजवाब............

Puja Upadhyay said...

आखिरी शेर लाजवाब है...वाह